न्यूज चैनलों का सीसीटीवी तमाशा




कुछ साल पहले की बात थी जब लगभग हर टीवी न्यूज चैनलों पर रात दस बजे के बाद कुछ खास किस्म के कार्यक्रम दिखाए जाते थे.. दस बजे नहीं कि न्यूज चैनल या तो अपराध या फिर भूत-प्रेत की कहानियां हिंदी दर्शकों को परोसने लगते थे.. हिंदी चैनल खास तौर पर इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि इस ग्रंथि के अधिकतर शिकार ये ही रहे थे.. इसके बाद और क्षेत्रीय भाषा के चैनलों को भी ये रोग लग गया.. उस दौर में जिस भी चैनल को स्विच कीजिए तो बस यही देखने को मिलता कि फलां किले में मत जाइयेगा वहां भूतों का बोलबाला है, फलां घर में चुडैलें रहती है.. कई साल तक ऐसे ही अगड़म-बगड़म कार्यक्रम दिखाकर न्यूज चैनल टीआरपी बटोरने का आसान रास्ता अपनाए रहे.. 
फिर एक समय आया जब टीवी न्यूज चैनलों से भूतों का दौर ख़त्म हुआ.. अब एक नया दौर शुरू हुआ है.. ये दौर है सीसीटीवी का.. यानि ऐसी घटनाओं को चैनल पर दिखाओ जो किसी न किसी तरह से सीसीटीवी में रिकॉर्ड हो गई हों.. उसमें एक्शन हो.. लाइव जैसा फील हो.. घटना भले ही दस सेकेंड से भी कम देर की हो लेकिन उसे बार-बार लूप करके दिखाया जा सके.. सेकेंडों में हुई घटना को घंटों तक खींचा जा सके.. बेजान सीसीटीवी फुटेज का ट्रीटमेंट ऐसा हो कि दर्शक हिल ना पाए.. बस इसी फॉर्मूले को अपनाकर आजकल न्यूज चैनल ख़बरें बनाने में लगे हैं.. और अपनी टीआरपी बढ़ाने में लगे हैं.. कुछ को फायदा हुआ तो बाकी तो हैं ही भीड़चाल का हिस्सा बनने का.. न्यूज चैनलों पर सीसीटीवी तमाशा दिखाने का..