ख्वाहिशें





आज तुम यहीं हो
पर तुम्हारी सोच कहीं आगे है
तुम्हें ढूंढती हूं यहीं
पर पाती हूं तुम्हें तुम्हारी सोच में..

आज मैं भी यहीं हूं
जीने की चाह है इस आज में
पर अकेली ही शायद जी रही हूं
एक ख्वाहिश की साथ में
तुम्हें ढूंढती हूं यूं ही..

एक ही आज में जब राहें अलग होती हैं
तो क्यों जीते हैं लोग साथ में
तमन्नाएं अलग होती हैं दोनों की
जानें क्यों फिर भी जीते मरते हैं
लिए हाथ में एक दूजे का हाथ...

खुशियां भी हैं दामन में 
पर वो नहीं जो ख्वाहिशें हैं दामन की
चाहती हूं खुश होना इन खुशियों से 
पर क्या करूं दामन जो खुश नहीं..

दोनों की ख्वाहिश होती है रहें खुश साथ में
जान भी लगा देते हैं एक दूसरे की ख्वाहिशात में
खुश होते हैं कि वो खुश हैं
पर पाते हैं खुद को अलग अपनी सोच में

मिटा सकते नहीं दोनों अपने वजूद को
फिर भी जारी हैं ख्वाहिशें दोनों की 
अलग राहों से ही सही
पहुंचे साथ एक ही मंजिल को...
साभार
दीप्ति