राजनीति का थप्पड़ कांड

राजनीति में कुछ प्यादे ऐसे होते हैं जिनका गाहे-बगाहे खूब इस्तेमाल किया जाता है. सियासी खेल की ये पटकथा किसी बॉलीवुड के फिल्म की तरह दिखाई देती है और छायांकन भी उसी के जैसा टीवी के स्क्रीन पर चमकता है. एक नेता अनशन पर बैठा है. उसके आसपास समर्थकों की भीड़ है. सभी नेता के आस- पास देखभाल में लगे हैं. मीडिया का जमावड़ा है. लाइव इवेंट का पहले से ही इंतजाम है. तभी, एक नौजवान आता है और नेता के गालों पर एक करारा तमाचा रसीद कर देता है. अफरा-तफरी मच जाती है. नेता के समर्थक नौजवान पर पिल पड़ते हैं. लाइव इवेंट का मसाला मिलते देख सारे रिपोर्टर चौकन्ने हो जाते हैं. फिर शुरू होता है टीवी का तमाशा. दूसरे ही पल, सारे समाचार चैनलों पर धड़ाधड़ इस मसालेदार इवेंट को दिखाया जाने लगता है.
अचानक से ही नेता को थप्पड़ का वीडियो सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगता है. यानी कि, जिस उद्धेश्य के लिए नौजवान को भेजा जाता है, वो पूरी तरह से सफल हो जाता है. जितना फुटेज इस घटना को मिलनी चाहिये उससे कहीं ज्यादा मिल जाती है. ऐसा तो कोई बॉलीवुड फिल्म को भी नहीं मिलता जो करोड़ों लगाकर और महीनों मेहनत करके फिल्म पूरी करते हैं. उन्हें तो फिल्म प्रमोट करने के लिए कई टीवी चैनलों पर जाकर, कॉमेडी शो में नौटंकी करनी होती है. लेकिन, इतने छोटे से मंच पर ही नेता के प्यादे अपना कमाल दिखा देते हैं और काम हो जाता है. फिर कुछ समय के बाद कौन पूछता है कि किसने किसको मारा, कौन था जिसने थप्पड़ कांड को अंजाम दिया, उसे ही इस काम के लिए क्यों चुना गया, क्या उसने नेतागीरी में अपनी जगह पक्की करने के लिए ऐसा दांव खेला था या फिर उसकी कोई मजबूरी थी, इस ड्रा्मे की स्क्रिप्ट किसने लिखी? अजी क्या फर्क पड़ता है..राजनीति में तो सब चलता है..