आधुनिक समय में ज़िंदा हुई पुरातन परंपराएं...

वियतनाम एक अदभुत देश है. इस समाजवादी गणराज्य की करीब 85 फीसद आबादी बौद्ध धर्म का अनुसरण करती है. पिछले एक दशक में वियतनाम का आर्थिक विकास काफी तेज़ी से हुआ है. आधुनिकता की तेज़ी से सीढ़ियां चढ़ते इस देश में आजकल एक खास किस्म की पुरातन परंपरा का ज़ोर वापसी करता दिखाई दे रही है. इसका नाम है, 'हाउ दोंग'. 2005 से पहले तक 'हाउ दोंग' पर वियतनाम की कम्युनिस्ट पार्टी ने अंधविश्वास फैलाने के नाम पर बैन लगाया हुआ था. लेकिन 2005 में हाउ दोंग से बैन हटा दिया गया. रहस्यमयी आत्माओं को बुलाने वाली इस परंपरा का वियतनामी समाज में दोबारा आगमन हुआ है. यूनेस्को ने पिछले साल इसे कल्चरल हेरिटेज का हिस्सा मानते हुए मान्यता दी तो इस साल से ये परंपरा दोबारा ज़िंदा हो गई है.
'हाउ दोंग' में जंगल, जल और स्वर्ग की सत्ता की मान्यता है. इसके केंद्र में देवी की पूजा है. इसमें पूजा के वक्त तेज़ लोक संगीत बजाया जाता है. पूजा में शामिल होने वाले लोग इतिहास और मिथकों के पात्र में बदल जाते हैं. लोग खूब डांस करते हैं और ऐसा लगने लगता है कि पूजा में शामिल लोगों के अंदर आत्माएं प्रवेश करने लगती हैं. लोग घुटने टेकने लगते हैं. इस दौरान लाखों-करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाया जाता है. असल, में वियतनाम में आर्थिक उदारीकरण के बाद से जैसे जैसे संपन्नता बढ़ी वैसे-वैसे 'हाउ दोंग' के मनाने में भी पैसे का बोलबाला बढ़ा है. हैरत की बात है कि रहस्यमयी आत्माओं से संबंधित इस पुरातन परंपरा को मानने वाले कोई अनपढ़ और गंवई तबके के लोग ही नहीं होते हैं बल्कि इसमें समाज के लगभग हर हिस्से से समान रुप से भागीदारी होती है. अमीर हो या ग़रीब हर वर्ग इसमें पूरे जोश के साथ शिरकत करता है. हालांकि इसे 2016 में यूनेस्को ने सांस्कृतिक विरासत के तौर पर मान्यता दी है, लेकिन ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि जैसे-जैसे 'हाउ दोंग' में पैसे और दिखावे का बोलबाला बढ़ेगा वैसे-वैसे अंधविश्वास और आस्था की रेखा मलीन होगी और फिर से सवाल खड़े होने शुरू होंगे.

'हाउ दोंग' जैसी परंपराएं केवल वियतनाम में ही लोकप्रिय नहीं है, बल्कि इससे मिलती जुलती कई परंपराएं भारत के कई इलाकों में भी खूब प्रचलित है. शरीर में देवी का आना जैसी कहानियां तो सबने सुनी ही होंगी. हिंदुस्तान में कई मंदिरों और दरगाहों में झाड़-फूंक कर आत्माओं को बुलाने और उतारने का काम धड़ल्ले से होता है. समाज का कई वर्ग इन रिच्युएल में शामिल होता है.
कुछ मंदिरों और दरगाहों के नाम जहां आज भी पुरातनपंथी परापराएं आधुनिकता के साथ कदमकताल कर रही हैं:
गुलबर्गा ज़िले का मशहूर 'दत्तात्रेय मंदिर' में शरीर से बुरी आत्माओं को भगाए जाने की मान्यता है.
राजधानी दिल्ली के मशहूर 'निज़ामुद्दीन दरगाह' में गुरुवार को जहां एक तरफ मनमोहक कव्वाली गाई जाती है वहीं दूसरी तरफ कुछ कमरों में जिस्म से शैतान उतारने का भी काम होता है.
गुजरात के मशहूर 'हजरत सैय्यद अली मीरा दातार दरगाह' में डॉक्टरों और इलाज से नाउम्मीद लोग जिन्नों के कब्जे से मुक्ति के लिए आते हैं. यहां हर धर्म के लोग अपनी परेशानियों से निजात पाने के लिए आते हैं.
मध्य प्रदेश के बैतूल जिले का 'देवजी महाराज मंदिर' आस्था और विश्वास का ऐसा केंद्र है जहां हर साल 'भूत मेला' लगता है और जमकर झाड़ फूंक होता है.