इक अधूरी सी दास्तां

एक अधूरी सी दास्तां कहना अब भी बाक़ी है
कहा अब तक नहीं दिले बयां बाक़ी है
दिलों की गहराई को मापना अब भी बाक़ी है
इक अधूरी सी दास्तां कहना अब भी बाक़ी है

तेरी नज़रों ने मुझे अब तक नहीं जाना है
मेरी दिल की गहराई को नहीं पहचाना है
तेरा ख़्वाब भी अभी तक मुझसे अनजाना है
तेरी नज़रों ने मुझे अब तक नहीं जाना है
मेरी इक बूंद है जिसे तुमने अभी तक थामा है
मेरी झील जहां बहती है वो जगह अभी भी वीराना है
मेरा सागर तो अभी भी मुझसे अनजाना है
मेरी इक बूंद है जिसे तुमने अभी तक थामा है

थी ख़्वाहिश सागर की गहराई में समा जाने की
पर शायद विधाता ने रची है साजिश 
मेरी किसमत आजमाने की
मुझे ख़्वाहिश है अब तो उसी के दर जाने की
थी चाहत सागर की गहराई में समा जाने की
या तो सूरज जरा पंख लगा दे तू मेरी बूंदों को 
धरा से उड़ के बादल बन जाऊं मैं
फिर जब भी बरसूं धरा पे
सीधे सागर की गहराई में मिल जाऊं मैं
  साभार: दीप्ति