रोशनी की ओर

अब न मैं भटकूंगी किसी ओर
क्योंकि खींचे है मुझे
एक डोर रोशनी की ओर
चाहे तू दे मुझे सुखों का अंबार 
या दे तू दुखों का पहाड़
अब मैं न भटकूंगी किसी ओर 
क्योंकि खींचे है मुझे 
एक डोर रोशनी की ओर
उब चुकी हूं सुख के सागर में गोते लगाकर
थक चुकी हूं दुख की दरियों से पार पाकर
अब न मैं भटकूंगी किसी ओर
क्योंकि खींचे है मुझे 
एक डोर रोशनी की ओर
दिखती है हर तरफ 
अब तेरी परछाई
हो सुख या हो दुख
अब लगते हैं एक समान
अब तू भी ले ये जान
क्योंकि खींचे है मुझे 
एक डोर रोशनी की ओर
तेरी दी हुई है राह
तेरे दिए हुए हैं संगराही
हर किसी को जोड़ा एक दूजे से
फेंका माया जाल
अब न मैं भटकूंगी किसी ओर
क्योंकि खींचे है मुझे 
एक डोर रोशनी की ओर
समझ में आती है अब तेरी माया
पर मेरे मन को है कुछ और भाया
पूरे करने है तेरे दिए हर काम
मैंने इस ज़िंदगी को किया अब तेरे नाम
अब न मैं भटकूंगी किसी ओर
क्योंकि खींचे है मुझे 
एक डोर रोशनी की ओर

साभार:दीप्ति